bapu


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रविवार, 9 अक्टूबर 2011

तेरे दरबार में झुकता है ....बापू सर मेरा......



तेरे दरबार में झुकता है ....बापू  सर  मेरा......

तेरे लिए जान भी हाज़िर है .............है क्या है मेरा.......

तेरे दरबार में झुकता है ....बापू  सर  मेरा......


तेरी रहमत .....तेरी रजा ...........है तक़दीर मेरी 

तेरी इबादत से पलटी है ..................लकीरे मेरी.....

रुख फिजा का बदल जाता .....ग़र.हो इशारा तेरा.....

तेरे दरबार में झुकता है....... बापू  सर  मेरा.....


तेरी राहों में है मंजिल ......बापू.... मेरी......

मुडती जेसे ......है ये राहें.......वेसे किस्मत मेरी 

तेरी राहों में है मंजिल... बापू   मेरी....

मुडती जेसे..... है ये राहें.......वेसे किस्मत मेरी 

ये गुजारिश है ..मेरे सर पे हाथ रहे तेरा.......

तेरे दरबार में झुकता है....... बापू  सर  मेरा.....



hariom

kamal hirani

contact :kemofdubai@gmail.com
dubai

शनिवार, 8 अक्टूबर 2011

मेरे घर के आगे बापू.... तेरा मंदिर बन जाये ........

मेरे  घर  के  आगे बापू.... तेरा  मंदिर   बन  जाये ........

जब  खिड़की  खोलू  तो......  तेरा  दर्शन  हो  जाये .....

 मेरे  घर  के  आगे बापू.... तेरा  मंदिर   बन  जाये .......

जब  आरती  हो  तेरी ..... मुझे  घंटी  सुनाई  दे ........
मुझे  रोज  सवेरे  बापू .... तेरी  सूरत  दिखाई  दे .....
जब  भजन  करे  मिल  कर ..... रस  कानो   में  घुल  जाये ....
जब  खिड़की  खोलू  तो......  तेरा  दर्शन  हो  जाये .....

आते  जाते  बापू .............. मै  तुमको  प्रणाम  करू ............
जो  मेरे  लायक  हो  ..............कुछ  ऐसा  काम  करू ....

तेरी  सेवा  करने  से .......... मेरी  किस्मत  खुल  जाये .......
जब  खिड़की  खोलू  तो......  तेरा  दर्शन  हो  जाये .....

नजदीक  रहेंगे  तो ...... आना- जाना  होगा...........
अब  भक्तो   का  बापू  .......मिलना  झुलना  होगा .....
 सब  साथ  रहे  बापू ....... जल्दी  वो  दिन  आये ........
मेरे  घर  के  आगे बापू.... तेरा  मंदिर   बन  जाये ........
जब  खिड़की  खोलू  तो......  तेरा  दर्शन  हो  जाये .....

बुधवार, 5 अक्टूबर 2011

दान की महिमा.........dont misssssssss


एक भिखारी सुबह-सुबह भीख मांगने निकला

 चलते समय उसने अपनी झोली में जौ के मुट्ठी भर दाने डाल लिए

टोटके या अंधविश्वास के कारण भिक्षाटन के लिए निकलते समय भिखारी अपनी झोली खाली नहीं रखते। 

थैली देख कर दूसरों को लगता है कि इसे पहले से किसी ने दे रखा है।

 पूर्णिमा का दिन था, 

भिखारी सोच रहा था कि आज ईश्वर की कृपा होगी तो मेरी यह झोली शाम से पहले ही भर जाएगी।


अचानक सामने से राजपथ पर उसी देश के राजा की सवारी आती दिखाई दी।

 भिखारी खुश हो गया। उसने सोचा,

 राजा के दर्शन और उनसे मिलने वाले दान से सारे दरिद्र दूर हो जाएंगे, 

जीवन संवर जाएगा।

 जैसे-जैसे राजा की सवारी निकट आती गई,

 भिखारी की कल्पना और उत्तेजना भी बढ़ती गई।

 जैसे ही राजा का रथ भिखारी के निकट आया,

 राजा ने अपना रथ रुकवाया, उतर कर उसके निकट पहुंचे।

 भिखारी की तो मानो सांसें ही रुकने लगीं।

 लेकिन राजा ने उसे कुछ देने के बदले उलटे अपनी बहुमूल्य चादर उसके सामने फैला दी और भीख की याचना करने लगे


भिखारी को समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे। 

अभी वह सोच ही रहा था कि राजा ने पुन: याचना की। 

भिखारी ने अपनी झोली में हाथ डाला, 

मगर हमेशा दूसरों से लेने वाला मन देने को राजी नहीं हो रहा था।

 जैसे-तैसे कर उसने दो दाने जौ के निकाले और उन्हें राजा की चादर पर डाल दिया।

 उस दिन भिखारी को रोज से अधिक भीख मिली, मगर वे दो दाने देने का मलाल उसे सारे दिन रहा

 शाम को जब उसने झोली पलटी तो उसके आश्चर्य की सीमा न रही।

 जो जौ वह ले गया था, उसके दो दाने सोने के हो गए थे।

 उसे समझ में आया कि यह दान की ही महिमा के कारण हुआ है। 

वह पछताया कि काश! उस समय राजा को और अधिक जौ दी होती, लेकिन नहीं दे सका, 

क्योंकि देने की आदत जो नहीं थी। 

hariommmmmmmmmmmmmmmmmmm


बुधवार, 3 अगस्त 2011

एक फकीरा आया मोटेरा के गाँव में .........

एक फकीरा आया मोटेरा के गाँव में .........




आ बैठा वो नीम की ठंडी छाव में........

होठों पे मुस्कान है.......छाले पाव में......

आ बैठा इक नीम की ठंडी छाव में .....


कभी अलाह अलाह बोले....कभी राम नाम धुन गाये ...

कभी अलाह अलाह बोले....कभी राम नाम धुन गाये ...

कोई कहे संत लगता है ...कोई पीर-फकीर बताये .....

जाने किस्से बाते करे हवाओ में ...

आ बैठा इक नीम की ठंडी छाव में......

हे कौन कोई न जाने ...

कोई उसको न पहचाने ...

चोला फकीर का पहना..........................
​............ देखो जग के दाता ने ...




देखो सबकी मांगे खेर दुवाओ में......

आ बैठा इक नीम की ठंडी छाव में.... ...

वो जिसको हाथ लगाये ....

उसका हर दुःख मिट जाए .....

वो दे दे जिसे विबुती....

.हर ख़ुशी उसे मिल जाए....

काटे चुन कर फुल बिछाये राहों में.....

आ बैठा इक नीम की ठंडी छाव में....

एक फकीरा आया मोटेरा के गाँव में .........

आ बैठा वो नीम की ठंडी छाव में........











मंगलवार, 2 अगस्त 2011

ज़िन्दगी कैसी कैसी किस किस को मिली ...................





कोई बसों में चक्कर लगा के जी रहा है
कोई ट्रेन की सीटी ही सपनो में सुन रहा है

कोई ऐ सी में बैठके भी थका रहता है
कोई सर के नीचे ईंट रख के सोता है

कोई अपनी ज़िन्दगी में लगा रहता है
कोई दुसरे की ज़िन्दगी में ही लगा रहता है

कोई अखबार के पन्नों में ही दिन निकाल देता
कोई बिन पढ़े ही हाकर को पैसे दे दिया है करता

किसी की आँख खुलती है सपनो के आसमान पर
किसी की आँख खुलती है तो टिकती है आसमान पर

पान की दूकान पर खड़े हुए कोई दिन बिताता है
कोई लाल पीले रंग में ही रंगा नज़र आता है

कोई अपनी धुन में जिए जा रहा है
कोई एक ही धुन सुने जा रहा है

किसी को तो आँख नाम सी रहती है
किसी को किसी की कमी नहीं खलती है

कोई मुद्दों से फिरा जा रहा है
किसी को मुद्दों से फिराया जा रहा है

कोई नाटक के मंच की तरह ज़िन्दगी को देखता है
कोई जितना भी बोलता है बहुत तोल के बोलता है

कोई बेगानों के ग़म पर भी रोता है
कोई अपनों को ग़म देके हँसता है

कोई जीता है ऐसे जैसे पल पल मरता हो
कोई जीता है ऐसे जैसे पल पल जीता हो

कोई मर कर भी जिंदा रहता है
कोई जिंदा है पता नहीं चलता है

ज़िन्दगी कैसी कैसी किस किस को मिली है


पर ज़िन्दगी सही उसको मिली है जिसने गुरु को माना गुरु को जाना और गुरु को अपना बनाया.....


तो आओ भैया आज के युग में लाखो लाखो लोगो को फायदा हुआ है ...बापू जी दीक्षा लेके .....

आओ आप भी बड़ो आगे....देर न करो....ये मौका बार बार नही आता...

गुरूजी बोलते है तू मुझे अपना उर-आगन  दे दे....में उसे खुशियों से न भर दू तो कहना .......

एक बार सत्संग में जाके तो देखो ....दिल से उन्हें याद कर  के तो देखो.... अगर फायदा न मिले तो फिर कहना 

शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

जो सत्संग में आगे बैठते हैं

ऊँची समझ:



एक संत के पास बहरा आदमी सत्संग सुनने आता था।

 उसे कान तो थे पर वे नाड़ियों से जुड़े नहीं थे। एकदम बहरा, एक शब्द भी सुन नहीं सकता था।

 किसी ने संतश्री से कहाः


"बाबा जी ! वे जो वृद्ध बैठे हैं, वे कथा सुनते-सुनते हँसते तो हैं पर वे बहरे हैं।"
बहरे मुख्यतः दो बार हँसते हैं – एक तो कथा सुनते-सुनते जब सभी हँसते हैं तब

 और दूसरा, अनुमान करके बात समझते हैं तब अकेले हँसते हैं।


बाबा जी ने कहाः "जब बहरा है तो कथा सुनने क्यों आता है ?

रोज एकदम समय पर पहुँच जाता है। चालू कथा से उठकर चला जाय ऐसा भी नहीं है,

घंटों बैठा रहता है।"
बाबाजी सोचने लगे, "बहरा होगा तो कथा सुनता नहीं होगा और कथा नहीं सुनता होगा

 तो रस नहीं आता होगा। रस नहीं आता होगा तो यहाँ बैठना भी नहीं चाहिए,


उठकर चले जाना चाहिए। यह जाता भी नहीं है !''

बाबाजी ने उस वृद्ध को बुलाया और उसके कान के पास ऊँची आवाज में कहाः "कथा सुनाई पड़ती है ?"

उसने कहाः "क्या बोले महाराज ?"

बाबाजी ने आवाज और ऊँची करके पूछाः "मैं जो कहता हूँ, क्या वह सुनाई पड़ता है ?"

उसने कहाः "क्या बोले महाराज ?"

बाबाजी समझ गये कि यह नितांत बहरा है।

बाबाजी ने सेवक से कागज कलम मँगाया और लिखकर पूछा...

वृद्ध ने कहाः "मेरे कान पूरी तरह से खराब हैं। मैं एक भी शब्द नहीं सुन सकता हूँ।"


कागज कलम से प्रश्नोत्तर शुरू हो गया।

"फिर तुम सत्संग में क्यों आते हो ?"

"बाबाजी ! सुन तो नहीं सकता हूँ लेकिन यह तो समझता हूँ कि ईश्वरप्राप्त महापुरुष जब बोलते हैं तो

पहले परमात्मा में डुबकी मारते हैं।

संसारी आदमी बोलता है तो उसकी वाणी मन व बुद्धि को छूकर आती है

 लेकिन ब्रह्मज्ञानी संत जब बोलते हैं तो उनकी वाणी आत्मा को छूकर आती हैं।

 मैं आपकी अमृतवाणी तो नहीं सुन पाता हूँ पर उसके आंदोलन मेरे शरीर को स्पर्श करते हैं।

 दूसरी बात, आपकी अमृतवाणी सुनने के लिए जो पुण्यात्मा लोग आते हैं

उनके बीच बैठने का पुण्य भी मुझे प्राप्त होता है।"


बाबा जी ने देखा कि ये तो ऊँची समझ के धनी हैं।

 उन्होंने कहाः "आप दो बार हँसना, आपको अधिकार है

किंतु मैं यह जानना चाहता हूँ कि आप रोज सत्संग में समय पर पहुँच जाते हैं और आगे बैठते हैं,

ऐसा क्यों ?"


"मैं परिवार में सबसे बड़ा हूँ। बड़े जैसा करते हैं वैसा ही छोटे भी करते हैं।

 मैं सत्संग में आने लगा तो मेरा बड़ा लड़का भी इधर आने लगा।

शुरुआत में कभी-कभी मैं बहाना बना के उसे ले आता था।

 मैं उसे ले आया तो वह अपनी पत्नी को यहाँ ले आया,

 पत्नी बच्चों को ले आयी – सारा कुटुम्ब सत्संग में आने लगा, कुटुम्ब को संस्कार मिल गये।"


ब्रह्मचर्चा, आत्मज्ञान का सत्संग ऐसा है कि यह समझ में नहीं आये तो क्या,
 
 सुनाई नहीं देता हो तो भी इसमें शामिल होने मात्र से इतना पुण्य होता है
 
कि व्यक्ति के जन्मों-जन्मों के पाप-ताप मिटने एवं एकाग्रतापूर्वक सुनकर इसका मनन-निदिध्यासन करे
 
 उसके परम कल्याण में संशय ही क्या !
 
 
 
(पूज्य बापू जी के सत्संग-प्रवचन से)
 


waah bapuji waah.........

kya mast satsang karte ho....
mazza aa jata hai mere.....sai
kitna saral samjate ho.....
aapke satsang ko par k bhi aisa lagta hai jese samne beth k samja rhe ho....
or us satsang me hasa bhi dete ho rula bhi dete ho..........
or ishwer k raste laga bhi dete ho............
waah mere saiya tera kya kehna............
aap bhi pariye bapuji ka mast satsang ......agar rona na aa jaye tho bolna.............


visit here: http://www.loveubapu.blogspot.com/

hariommmmmmmmmmmm

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गुरुवार, 14 जुलाई 2011

बापूजी का खजाना ( गुरुपूनम पर्व-15-07-2011 )

शिष्यों का अनुपम पर्व:


साधक के लिये गुरुपूर्णिमा व्रत और तपस्या का दिन है।


 उस दिन साधक को चाहिये कि उपवास करे या दूध, फल अथवा अल्पाहार ले,

 गुरु के द्वार जाकर गुरुदर्शन, गुरुसेवा और गुरु-सत्सन्ग का श्रवण करे।

 उस दिन गुरुपूजा की पूजा करने से वर्षभर की पूर्णिमाओं के दिन किये हुए सत्कर्मों के

पुण्यों का फल मिलता है।



गुरु अपने शिष्य से और कुछ नही चाहते।

वे तो कहते हैं:
                          तू मुझे अपना उर आँगन दे दे, मैं अमृत की वर्षा कर दूँ ।



तुम गुरु को अपना उर-आँगन दे दो।

अपनी मान्यताओं और अहं को हृदय से निकालकर गुरु से चरणों में अर्पण कर दो।

 गुरु उसी हृदय में सत्य-स्वरूप प्रभु का रस छलका देंगे।

गुरु के द्वार पर अहं लेकर जानेवाला व्यक्ति गुरु के ज्ञान को पचा नही सकता,

हरि के प्रेमरस को चख नहीं सकता।




जो शिष्य सदगुरु का पावन सान्निध्य पाकर आदर व श्रद्धा से सत्संग सुनता है

सत्संग-रस का पान करता है, उस शिष्य का प्रभाव अलौकिक होता है,



कितने ही कर्म करो, कितनी ही उपासनाएँ करो, कितने ही व्रत और अनुष्ठान करो,

 कितना ही धन इकट्ठा कर लो और् कितना ही दुनिया का राज्य भोग लो

लेकिन जब तक सदगुरु के दिल का राज्य तुम्हारे दिल तक नहीं पहुँचता,

सदगुरुओं के दिल के खजाने तुम्हारे दिल तक नही उँडेले जाते,

जब तक तुम्हारा दिल सदगुरुओं के दिल को झेलने के काबिल नहीं बनता,

तब तक सब कर्म, उपासनाएँ, पूजाएँ अधुरी रह जाती हैं।

देवी-देवताओं की पूजा के बाद भी कोई पूजा शेष रह जाती है

किंतु सदगुरु की पूजा के बाद कोई पूजा नहीं बचती।




सदगुरु अंतःकरण के अंधकार को दूर करते हैं।

आत्मज्ञान के युक्तियाँ बताते हैं गुरु प्रत्येक शिष्य के अंतःकरण में निवास करते हैं।

वे जगमगाती ज्योति के समान हैं जो शिष्य की बुझी हुई हृदय-ज्योति को प्रकटाते हैं।

 गुरु मेघ की तरह ज्ञानवर्षा करके शिष्य को ज्ञानवृष्टि में नहलाते रहते हैं।

 गुरु ऐसे वैद्य हैं जो भवरोग को दूर करते हैं।

 गुरु वे माली हैं जो जीवनरूपी वाटिका को सुरभित करते हैं।

गुरु अभेद का रहस्य बताकर भेद में अभेद का दर्शन करने की कला बताते हैं।

 इस दुःखरुप संसार में गुरुकृपा ही एक ऐसा अमूल्य खजाना है

जो मनुष्य को आवागमन के कालचक्र से मुक्ति दिलाता है।



जीवन में संपत्ति, स्वास्थ्य, सत्ता, पिता, पुत्र, भाई, मित्र अथवा जीवनसाथी से भी ज्यादा

 आवश्यकता सदगुरु की है।

 सदगुरु शिष्य को नयी दिशा देते हैं, साधना का मार्ग बताते हैं और ज्ञान की प्राप्ति कराते हैं।




सच्चे सदगुरु शिष्य की सुषुप्त शक्तियों को जाग्रत करते हैं,

 योग की शिक्षा देते हैं, ज्ञान की मस्ती देते हैं,

 भक्ति की सरिता में अवगाहन कराते हैं और कर्म में निष्कामता सिखाते हैं।

इस नश्वर शरीर में अशरीरी आत्मा का ज्ञान कराकर जीते-जी मुक्ति दिलाते हैं।







सदगुरु जिसे मिल जाय सो ही धन्य है जन मन्य है।



सुरसिद्ध उसको पूजते ता सम न कोऊ अन्य है॥



अधिकारी हो गुरुदेव से उपदेश जो नर पाय है।



भोला तरे संसार से नहीं गर्भ में फिर आय है॥






अपने संकल्प के अनुसार गुरु को मन चलाओ

लेकिन गुरु के संकल्प में अपना संकल्प मिला दो तो बेडा़ पार हो जायेगा।



नम्र भाव से, कपटरहित हृदय से गुरु से द्वार जानेवाला कुछ-न-कुछ पाता ही है।

aap sabhi ko guru purima ki hardik shubkamnaye....
hariommmmmmmmmmm